डोपिंग का मकड़जाल: खिलाड़ी कहीं कर न दें ये 5 बड़ी गलतियाँ!

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आजकल खेल जगत में एक ऐसा मुद्दा है जो हर किसी को सोचने पर मजबूर कर देता है – डोपिंग! क्या आपने कभी सोचा है कि कुछ एथलीट अपनी जीत के लिए अपने शरीर और करियर को दांव पर क्यों लगा देते हैं?

यह सिर्फ मैदान पर प्रदर्शन का सवाल नहीं है, बल्कि ईमानदारी, नैतिकता और खेल भावना का भी है. मैंने खुद कई बार देखा है कि कैसे एक छोटे से फैसले से एक एथलीट का पूरा जीवन बदल जाता है.

खेल दवाएं और डोपिंग सिर्फ नियमों का उल्लंघन नहीं हैं, बल्कि यह हमारे पसंदीदा खेलों की आत्मा को भी चोट पहुँचाती हैं. यह एक ऐसी गहरी समस्या है जिसकी जड़ें सिर्फ एथलीटों तक ही सीमित नहीं, बल्कि इसमें पूरा सिस्टम शामिल है.

चलिए, इस जटिल दुनिया के पीछे की सच्चाई को और गहराई से जानते हैं, ताकि हम सब मिलकर एक स्वच्छ खेल जगत का सपना देख सकें. नीचे दिए गए लेख में हम इस बारे में और विस्तार से जानेंगे!

खेल में धोखे का जाल: क्यों एथलीट करते हैं ऐसा?

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जीतने का दबाव और उम्मीदें

कभी-कभी मुझे लगता है कि हम एथलीटों से क्या उम्मीद करते हैं? हर कोई कहता है, “जीतना ही सब कुछ है,” और फिर जब कोई एथलीट जीतने के लिए कोई गलत रास्ता अपनाता है, तो हम हैरान हो जाते हैं। मैंने खुद देखा है कि कैसे एक छोटे से शहर का खिलाड़ी बड़े मंच पर आता है और उस पर अपने परिवार, अपने शहर, और कभी-कभी तो पूरे देश की उम्मीदों का पहाड़ टूट पड़ता है। यह दबाव इतना गहरा होता है कि कई बार खिलाड़ी उस दलदल में फंस जाते हैं जहां से बाहर निकलना नामुमकिन सा लगता है। उन्हें लगता है कि अगर वे नहीं जीते तो सब कुछ खत्म हो जाएगा, और इसी डर में वे उन दवाओं का सहारा ले लेते हैं जो उनकी शारीरिक क्षमता को कुछ देर के लिए बढ़ा तो देती हैं, लेकिन लंबी दौड़ में सब कुछ छीन लेती हैं। यह एक ऐसी लड़ाई है जिसमें एथलीट सिर्फ मैदान पर ही नहीं, बल्कि अपने अंदर भी लड़ता है। मुझे याद है एक बार एक युवा खिलाड़ी ने मुझसे कहा था, “हारने का मतलब है सब कुछ गंवा देना, जीतना ही एकमात्र रास्ता है।” यह सोच उन्हें डोपिंग की ओर धकेल देती है, जो एक बहुत ही दुखद सच्चाई है।

रातोंरात सफलता का लालच

आजकल हर कोई जल्द से जल्द सफल होना चाहता है, चाहे वह किसी भी क्षेत्र में हो। खेल भी इससे अछूता नहीं है। मुझे कई ऐसे एथलीटों के किस्से याद हैं जिन्होंने सालों तक कड़ी मेहनत की, लेकिन उन्हें उतना नाम नहीं मिला जितना उन्होंने सोचा था। वहीं, कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने शायद उतना संघर्ष नहीं किया, लेकिन डोपिंग के सहारे वे रातोंरात स्टार बन गए। यह देखकर अक्सर ईमानदार एथलीटों का मनोबल टूट जाता है। उन्हें लगता है कि उनकी मेहनत बेकार है और अगर उन्हें आगे बढ़ना है तो उन्हें भी यही रास्ता अपनाना पड़ेगा। यह लालच इतना खतरनाक होता है कि यह एक एथलीट की सालों की तपस्या और खेल के प्रति उसके जुनून को खत्म कर देता है। मैंने हमेशा माना है कि असली जीत वही है जो मेहनत और ईमानदारी से हासिल की गई हो, न कि किसी शॉर्टकट से। लेकिन यह शॉर्टकट का लालच कई बार इतना हावी हो जाता है कि अच्छे-खासे एथलीट भी इसमें फंस जाते हैं। यह सिर्फ एक दवा नहीं, बल्कि एक मानसिकता है जो खेल जगत को अंदर से खोखला कर रही है।

शरीर पर घातक असर: एक छोटी सी ‘मदद’ की कीमत

स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रभाव

आप सोच सकते हैं कि एक छोटी सी गोली या इंजेक्शन से क्या ही फर्क पड़ेगा? लेकिन हकीकत में, इन ‘मददगार’ दवाओं की कीमत शरीर को बहुत भारी पड़ती है। मैंने कई ऐसे एथलीटों को देखा है जो अपने करियर के बाद गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं, और उनमें से कई का कारण डोपिंग रहा है। स्टेरॉयड लेने से दिल का दौरा पड़ने का खतरा बढ़ जाता है, लिवर और किडनी खराब हो जाते हैं, और ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियां तो आम बात हो जाती हैं। महिलाओं में इन दवाओं के इस्तेमाल से हार्मोनल असंतुलन, पुरुषों जैसी शारीरिक बनावट और बांझपन जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं। पुरुषों में भी टेस्टोस्टेरोन के स्तर में गड़बड़ी और शुक्राणुओं की कमी देखी गई है। यह सिर्फ खेल के दिनों की बात नहीं है, बल्कि यह जीवनभर के लिए शरीर को अंदर से खोखला कर देता है। एक एथलीट का शरीर उसका मंदिर होता है, और डोपिंग इस मंदिर को धीरे-धीरे नष्ट कर देती है। यह जानकर बहुत दुख होता है कि कुछ एथलीट चंद पलों की जीत के लिए अपने पूरे जीवन का स्वास्थ्य दांव पर लगा देते हैं।

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मानसिक और भावनात्मक उथल-पुथल

शारीरिक प्रभावों के साथ-साथ, डोपिंग का मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर पड़ता है। मुझे लगता है कि यह बात अक्सर अनदेखी कर दी जाती है। इन दवाओं के सेवन से एथलीटों में मूड स्विंग्स, चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन और कभी-कभी तो आक्रामक व्यवहार भी देखा जाता है। वे अंदर से हमेशा एक डर और अपराधबोध में जीते हैं। उन्हें हर वक्त पकड़े जाने का डर सताता रहता है, जिससे उनका मानसिक तनाव बढ़ता है। मैंने ऐसे कई एथलीटों को करीब से देखा है जो डोपिंग के बाद खुद को बहुत अकेला और लाचार महसूस करते थे। खेल में जीत और हार से बढ़कर खिलाड़ी की मानसिक शांति मायने रखती है, लेकिन डोपिंग इसे पूरी तरह से छीन लेती है। यह सिर्फ उनके खेल को ही नहीं, बल्कि उनके निजी जीवन, रिश्तों और खुशियों को भी प्रभावित करता है। यह एक ऐसी अदृश्य दीवार बना देता है जो उन्हें सामान्य जीवन जीने से रोकती है।

डोपिंग का काला साया: करियर और इज्जत का दांव

खेल जगत से बाहर का रास्ता

सोचिए, आपने सालों तक खून-पसीना एक करके अपने खेल में महारत हासिल की, और एक छोटी सी गलती ने सब कुछ खत्म कर दिया। डोपिंग का दोषी पाए जाने पर एथलीटों पर प्रतिबंध लग जाता है, और अक्सर यह प्रतिबंध कई सालों तक चलता है। कुछ मामलों में तो उन्हें जीवनभर के लिए खेल से बाहर कर दिया जाता है। यह सिर्फ उनके खेलने का अधिकार छीन नहीं लेता, बल्कि उनके करियर के सारे दरवाजे बंद कर देता है। मैंने देखा है कि कैसे एक चमकता सितारा पलभर में गुमनाम हो जाता है। प्रायोजक उनसे मुंह मोड़ लेते हैं, टीम उन्हें बाहर कर देती है, और जो लोग कभी उनकी तारीफों के पुल बांधते थे, वही लोग उन्हें कोसने लगते हैं। यह सिर्फ खेल जगत से बाहर का रास्ता नहीं है, बल्कि एक एथलीट के सपने और पहचान का भी अंत है। यह एक बहुत ही कठोर सच्चाई है, लेकिन खेल जगत में ईमानदारी से बढ़कर कुछ नहीं।

कानूनी पचड़े और सामाजिक तिरस्कार

डोपिंग सिर्फ खेल नियमों का उल्लंघन नहीं है, बल्कि इसके कानूनी परिणाम भी हो सकते हैं, खासकर कुछ देशों में जहां इसे आपराधिक अपराध माना जाता है। एथलीटों को भारी जुर्माना भरना पड़ सकता है, और कभी-कभी तो जेल भी जाना पड़ सकता है। लेकिन इन सब से बढ़कर जो बात मुझे सबसे ज्यादा दुख पहुंचाती है, वह है सामाजिक तिरस्कार। जब एक एथलीट डोपिंग में पकड़ा जाता है, तो उसकी इज्जत और प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल जाती है। लोग उसे धोखेबाज कहने लगते हैं, उसके नाम के आगे एक काला धब्बा लग जाता है। मैंने देखा है कि कैसे एक हीरो विलेन बन जाता है। इस बदनामी का सामना करना किसी भी एथलीट के लिए बहुत मुश्किल होता है। उनके परिवार को भी इस बदनामी का बोझ उठाना पड़ता है। यह सिर्फ एक व्यक्ति की गलती नहीं, बल्कि पूरे समाज में उसकी छवि को हमेशा के लिए धूमिल कर देती है। मुझे हमेशा लगता है कि यह दाग इतना गहरा होता है कि इसे मिटाना लगभग नामुमकिन है।

पहचान के तरीके: क्या हम हमेशा एक कदम आगे हैं?

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आधुनिक विज्ञान की भूमिका

आजकल डोपिंग का पता लगाने के लिए विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली है। अब ऐसी-ऐसी तकनीकें आ गई हैं जो डोपिंग करने वाले एथलीटों के लिए भागना मुश्किल कर देती हैं। मुझे याद है पहले सिर्फ यूरिन टेस्ट होते थे, लेकिन अब ब्लड टेस्ट, हेयर फॉलिकल एनालिसिस और भी कई जटिल टेस्ट किए जाते हैं। वैज्ञानिक लगातार नए तरीकों पर काम कर रहे हैं ताकि डोपिंग करने वालों को पकड़ा जा सके। जैसे ही डोपर्स कोई नई दवा या तरीका ढूंढते हैं, वैज्ञानिक भी उसका पता लगाने का तरीका ढूंढ लेते हैं। यह एक तरह की चूहे-बिल्ली की दौड़ है, जिसमें ईमानदारी हमेशा जीतती है। मैंने खुद देखा है कि कैसे एक छोटी सी गलती भी अब पकड़ी जा सकती है, क्योंकि एंटी-डोपिंग एजेंसियां बहुत सतर्क हैं।

बायोमेट्रिक पासपोर्ट और लगातार जांच

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डोपिंग के खिलाफ लड़ाई में एथलीट बायोमेट्रिक पासपोर्ट (ABP) एक क्रांतिकारी कदम है। यह हर एथलीट के खून और हार्मोन के स्तर का एक व्यक्तिगत प्रोफाइल बनाता है। अगर किसी एथलीट के प्रोफाइल में कोई असामान्य बदलाव आता है, तो यह डोपिंग का संकेत हो सकता है, भले ही कोई विशिष्ट पदार्थ न पकड़ा जाए। मुझे यह तरीका बहुत प्रभावी लगता है क्योंकि यह सिर्फ एक बार के टेस्ट पर निर्भर नहीं करता, बल्कि एथलीट के शरीर में होने वाले बदलावों को लगातार ट्रैक करता है। इसके अलावा, अचानक होने वाली जांच (out-of-competition testing) भी डोपिंग पर लगाम लगाने में बहुत मददगार है। एथलीटों को कभी भी, कहीं भी जांच के लिए बुलाया जा सकता है, जिससे वे डोपिंग करने से डरते हैं। यह प्रणाली एक जाल की तरह काम करती है जिससे डोपिंग करने वालों का बच निकलना मुश्किल हो जाता है।

खेल भावना की रक्षा: हमारी सामूहिक जिम्मेदारी

शिक्षा और जागरूकता की शक्ति

मुझे लगता है कि डोपिंग के खिलाफ सबसे मजबूत हथियार शिक्षा और जागरूकता है। जब मैं युवा एथलीटों से बात करता हूं, तो मैं उन्हें हमेशा डोपिंग के खतरों और इसके दूरगामी परिणामों के बारे में बताता हूं। यह सिर्फ नियम तोड़ने की बात नहीं है, बल्कि अपने शरीर और करियर को तबाह करने की बात है। स्कूल, कॉलेज और खेल अकादमियों में डोपिंग के बारे में नियमित रूप से जानकारी देनी चाहिए। एथलीटों को यह समझना होगा कि साफ-सुथरा खेल ही असली खेल है। मैंने खुद कई बार देखा है कि सही जानकारी मिलने पर युवा एथलीट डोपिंग से दूर रहते हैं। हमें उन्हें यह भी बताना होगा कि जीतने से ज्यादा महत्वपूर्ण खेल भावना और ईमानदारी है।

मजबूत नियम और उनकी प्रभावी क्रियान्वयन

सिर्फ नियम बनाने से काम नहीं चलेगा, उन्हें सख्ती से लागू भी करना होगा। मुझे लगता है कि एंटी-डोपिंग एजेंसियों को और मजबूत बनाना चाहिए और उन्हें पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराने चाहिए ताकि वे अपनी जांच और शिक्षा कार्यक्रमों को बेहतर ढंग से चला सकें। डोपिंग करने वालों के लिए सजा सख्त होनी चाहिए ताकि दूसरों को सबक मिल सके। अगर नियमों को कमजोर किया जाएगा, तो डोपिंग करने वालों का हौसला बढ़ेगा। दुनिया भर की खेल संस्थाओं को मिलकर काम करना होगा ताकि डोपिंग के खिलाफ एक मजबूत वैश्विक मोर्चा बन सके। यह सिर्फ एक देश या एक खेल की समस्या नहीं है, बल्कि पूरे खेल जगत की समस्या है, और हमें मिलकर इसका समाधान ढूंढना होगा।

एथलीटों का दर्द: क्या सिर्फ वे ही दोषी हैं?

कोच, डॉक्टर और सपोर्ट स्टाफ की भूमिका

यह बात मुझे अक्सर परेशान करती है कि जब डोपिंग का कोई मामला सामने आता है, तो सारी उंगलियां सिर्फ एथलीट की तरफ उठती हैं। लेकिन क्या कभी हमने सोचा है कि इसमें कोच, डॉक्टर या सपोर्ट स्टाफ की क्या भूमिका होती है?

मैंने कई ऐसे मामले देखे हैं जहां कोच या डॉक्टर ने एथलीट को डोपिंग के लिए उकसाया या उसमें मदद की। कभी-कभी तो वे एथलीट को बिना बताए भी ऐसी दवाएं दे देते हैं। मुझे लगता है कि यह एक बहुत बड़ी साजिश होती है जिसमें कई लोग शामिल होते हैं। इन लोगों को भी उतनी ही गंभीरता से दंडित किया जाना चाहिए जितनी कि एथलीट को। वे खेल के मार्गदर्शक होते हैं, और अगर वे ही गलत रास्ता दिखाएंगे तो खेल का क्या होगा?

यह एक गहरा नैतिक प्रश्न है जिसका उत्तर ढूंढना बहुत जरूरी है।

एक समर्थक के रूप में हमारा फर्ज

हम, खेल के प्रशंसक, भी इस समस्या का हिस्सा हैं। हम अक्सर अपने पसंदीदा एथलीटों से इतनी ज्यादा उम्मीदें लगा लेते हैं कि उन्हें हारने की गुंजाइश ही नहीं बचती। हमें यह समझना होगा कि खेल सिर्फ जीत-हार का नाम नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, मेहनत और खेल भावना का भी नाम है। हमें डोपिंग करने वाले एथलीटों को कतई बढ़ावा नहीं देना चाहिए और स्वच्छ खेल का समर्थन करना चाहिए। जब कोई एथलीट डोपिंग में पकड़ा जाता है, तो हमें उसे तुरंत खारिज करने की बजाय उसके पीछे के कारणों को समझने की कोशिश करनी चाहिए और उसे सही रास्ते पर लाने में मदद करनी चाहिए। मुझे लगता है कि अगर हम सब मिलकर एक सकारात्मक माहौल बनाएंगे, तो डोपिंग की समस्या से निपटना आसान होगा। हमारा फर्ज सिर्फ ताली बजाना नहीं, बल्कि खेल की नैतिकता और मूल्यों की रक्षा करना भी है।

प्रतिबंधित पदार्थ के प्रकार उदाहरण संभावित प्रभाव
एनाबॉलिक एजेंट (Anabolic Agents) स्टेरॉयड (Steroids), टेस्टोस्टेरोन (Testosterone) मांसपेशियों का तेजी से विकास, ताकत में वृद्धि
पेप्टाइड हार्मोन (Peptide Hormones) एरिथ्रोपोइटिन (EPO), वृद्धि हार्मोन (Growth Hormone) रक्त में ऑक्सीजन वहन क्षमता बढ़ाना, चोट से उबरने में मदद
बीटा-2 एगोनिस्ट (Beta-2 Agonists) सालबुटामोल (Salbutamol) फेफड़ों की क्षमता बढ़ाना, मांसपेशियों पर प्रभाव
मूत्रवर्धक (Diuretics) फ़्यूरोसेमाइड (Furosemide) शरीर से पानी निकालना, अन्य पदार्थों को छिपाने में मदद
उत्तेजक (Stimulants) एम्फ़ैटेमिन (Amphetamines), कोकीन (Cocaine) चौकसी बढ़ाना, थकान कम करना, आक्रामकता
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글을마चते हुए

तो दोस्तों, आज हमने खेल में डोपिंग के काले जाल, इसके पीछे की मजबूरियों और इसके भयानक परिणामों पर खुलकर बात की। मुझे पूरी उम्मीद है कि इस चर्चा से आपको यह समझने में मदद मिली होगी कि क्यों हमें स्वच्छ खेल का समर्थन करना चाहिए और एथलीटों को इस दलदल में फंसने से बचाना चाहिए। याद रखिए, जीत से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है ईमानदारी और खेल भावना, जो हमें असली चैंपियन बनाती है। हम सब मिलकर ही इस समस्या से लड़ सकते हैं और खेल जगत को और भी पवित्र बना सकते हैं।

जानने लायक कुछ खास बातें

1. कोई भी सप्लीमेंट या दवा लेने से पहले हमेशा उसकी जांच करें और किसी विश्वसनीय स्रोत से सलाह लें। कई बार अनजाने में भी प्रतिबंधित पदार्थ शरीर में चले जाते हैं।
2. अपने खेल संघ और विश्व डोपिंग रोधी एजेंसी (WADA) के नियमों को अच्छी तरह समझें। जानकारी ही सबसे बड़ा बचाव है।
3. अगर आप दबाव महसूस कर रहे हैं या किसी को डोपिंग करते देखते हैं, तो तुरंत किसी विश्वसनीय व्यक्ति या एंटी-डोपिंग एजेंसी से संपर्क करें। चुप रहना समस्या को और बढ़ाएगा।
4. हमेशा अपने स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें। कोई भी जीत आपके शरीर और भविष्य से बढ़कर नहीं है।
5. अपने कोच और सपोर्ट स्टाफ के साथ खुलकर बात करें। उनकी सलाह और मार्गदर्शन आपको सही रास्ते पर रहने में मदद करेगा, खासकर जब मुश्किल फैसले लेने हों।

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खास बातें एक नज़र में

खेल में डोपिंग सिर्फ़ एक नियम का उल्लंघन नहीं, बल्कि एथलीट के करियर, स्वास्थ्य और सम्मान को तबाह करने वाला एक गंभीर मुद्दा है। मैंने अपने अनुभव से देखा है कि कैसे जीतने का अत्यधिक दबाव और रातोंरात सफलता का लालच युवा खिलाड़ियों को इस अंधेरे रास्ते पर धकेल देता है। लेकिन इसके शारीरिक और मानसिक प्रभावों के साथ-साथ, पकड़े जाने पर कानूनी पचड़े और सामाजिक तिरस्कार भी झेलना पड़ता है। आधुनिक विज्ञान और बायोमेट्रिक पासपोर्ट जैसी तकनीकें डोपिंग का पता लगाने में अब काफी सक्षम हैं, जिससे धोखेबाजों का बचना मुश्किल हो गया है। इसलिए, शिक्षा और जागरूकता के साथ-साथ सख्त नियमों का प्रभावी क्रियान्वयन बहुत ज़रूरी है। हमें यह भी समझना होगा कि डोपिंग के लिए सिर्फ़ एथलीट ही नहीं, बल्कि इसमें शामिल कोच और सपोर्ट स्टाफ भी बराबर के ज़िम्मेदार हैं। एक जागरूक प्रशंसक के तौर पर, हमारा फ़र्ज़ है कि हम साफ़-सुथरे खेल का समर्थन करें और एथलीटों पर अवास्तविक दबाव न डालें, ताकि खेल की सच्ची भावना हमेशा ज़िंदा रहे। आखिर में, मैं यही कहना चाहूँगा कि सच्ची जीत वही है जो ईमानदारी और मेहनत से हासिल की जाए, क्योंकि वही जीत हमें अंदर से खुशी और सम्मान देती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ) 📖

प्र: डोपिंग आखिर है क्या और एथलीट इसे क्यों लेते हैं?

उ: देखिए, डोपिंग का सीधा मतलब है किसी खेल में अपनी परफॉर्मेंस को बढ़ाने के लिए ऐसी दवाओं या तरीकों का इस्तेमाल करना जो गैर-कानूनी हों. आपने भी कई बार सुना होगा कि फलां एथलीट डोपिंग में पकड़ा गया.
लेकिन सवाल है कि वे ऐसा करते क्यों हैं? मेरे अनुभव से, इसके पीछे कई कारण होते हैं. सबसे बड़ा तो यही कि हर कोई जीतना चाहता है, सबसे आगे रहना चाहता है.
जब उन्हें लगता है कि उनकी सामान्य क्षमताएँ काफी नहीं हैं या वे दूसरों से पीछे छूट रहे हैं, तो वे एक ‘शॉर्टकट’ ढूंढते हैं. कुछ को कोच या टीम के दबाव का सामना करना पड़ता है, तो कुछ आर्थिक लाभ और प्रसिद्धि के चक्कर में पड़ जाते हैं.
मैंने ऐसे एथलीटों को करीब से देखा है जो एक बार इस दलदल में फँस जाते हैं, तो निकलना मुश्किल हो जाता है. उन्हें लगता है कि एक छोटी सी गोली या इंजेक्शन उन्हें शिखर पर पहुँचा देगा, पर वे भूल जाते हैं कि यह उनके करियर, स्वास्थ्य और सम्मान को हमेशा के लिए तबाह कर सकता है.
यह सिर्फ खेल भावना के खिलाफ नहीं, बल्कि अपने ही शरीर के साथ धोखा है.

प्र: डोपिंग का एथलीटों के स्वास्थ्य और करियर पर क्या असर पड़ता है?

उ: डोपिंग सिर्फ मैदान पर बेईमानी नहीं है, बल्कि यह एथलीट के पूरे जीवन को अंदर से खोखला कर देती है. मैंने खुद कई एथलीटों को डोपिंग के भयानक परिणामों से जूझते देखा है.
सबसे पहले तो, उनके शरीर पर बहुत बुरा असर पड़ता है. सोचिए, प्राकृतिक तरीके से जो शरीर नहीं कर सकता, उसे जबरदस्ती दवाओं से करवाने पर क्या होगा? लीवर, किडनी, दिल पर बहुत ज़्यादा दबाव पड़ता है, हार्मोनल संतुलन बिगड़ जाता है और मानसिक स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है.
कई बार तो जानलेवा बीमारियाँ भी हो जाती हैं. करियर की बात करें तो, अगर कोई एथलीट डोपिंग में पकड़ा जाता है, तो उसे खेल से निलंबित कर दिया जाता है, उसके मेडल और रिकॉर्ड छीन लिए जाते हैं.
मैंने देखा है कि कैसे एक चमकता हुआ करियर एक झटके में खत्म हो जाता है, सारी इज्ज़त मिट्टी में मिल जाती है. लोग उनसे नफरत करने लगते हैं, परिवार और दोस्तों को भी शर्मिंदा होना पड़ता है.
सबसे दुखद बात यह है कि वापसी करना लगभग नामुमकिन हो जाता है, क्योंकि एक बार भरोसा टूट जाए तो उसे जोड़ना बहुत मुश्किल होता है. मेरा मानना है कि कोई भी जीत इतनी बड़ी नहीं होती कि उसके लिए अपने स्वास्थ्य और सम्मान को दांव पर लगाया जाए.

प्र: हम खेल जगत को डोपिंग-मुक्त बनाने के लिए क्या कदम उठा सकते हैं?

उ: यह एक बहुत ही ज़रूरी सवाल है और इसका जवाब हम सबके सहयोग में छुपा है. मुझे लगता है कि डोपिंग से लड़ने के लिए सिर्फ कड़े नियम बनाना ही काफी नहीं है, बल्कि एक व्यापक रणनीति की ज़रूरत है.
सबसे पहले, एथलीटों को डोपिंग के खतरों और परिणामों के बारे में बचपन से ही जागरूक करना चाहिए. स्कूलों और स्पोर्ट्स अकादमियों में इसकी जानकारी देना बहुत ज़रूरी है.
मैंने कई बार देखा है कि जागरूकता की कमी के कारण भी युवा एथलीट गलत राह पर चले जाते हैं. दूसरा, डोपिंग टेस्ट को और ज़्यादा प्रभावी और अचानक बनाना होगा, ताकि कोई भी चालाक एथलीट बच न पाए.
तीसरा, उन लोगों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए जो एथलीटों को डोपिंग के लिए उकसाते हैं या दवाएँ मुहैया कराते हैं, चाहे वे कोच हों, डॉक्टर हों या कोई और. चौथा, एथलीटों को एक मजबूत सपोर्ट सिस्टम देना चाहिए, जहाँ वे बिना डरे अपनी समस्याओं को बता सकें और मानसिक दबाव से निपटने में मदद मिल सके.
मेरे हिसाब से, हमें ‘स्वच्छ खेल, स्वस्थ जीवन’ के सिद्धांत को अपनाना होगा. तभी हम अपने पसंदीदा खेलों को उनकी सच्ची भावना और गरिमा के साथ बचा पाएँगे.

📚 संदर्भ